Thursday, May 13, 2010

कलयुग .....एक बोध कथा

मैंने इससे पहले कभी कोई कहानी या लेख नहीं लिखा इसलिए जरूरी नहीं की भाव को सही शब्द दे सकूं इसलिए आपसे नम्र निवेदन है की मार्गदशन करें ....
एक बार देवलोक में मंथन हुआ की सृष्टि का समूल नाश कैसे हो ?
सतयुग, ने कहा .....मै पाप को जन्म लेने ही नहीं दूंगा
त्रेता, ने कहा ......मै पापी को सुधरने का एक मौका दूंगा 
द्वापर ,ने कहा ...........मै पापी को सख्त सज़ा दूंगा
अंत में कलयुग ने कहा ...देवो आइये मै आपको दिखता हूँ की मै किस तरह सृष्टि का समूल नाश करूँगा ,.सबने प्रथ्वी की और देखा ....देखते क्या है की.......................................................................................................
" दो मित्र थे दोनों के घर में अन्न का अभाव था कई दिन से बच्चे भूखे थे ,दोनों मित्र शिकार की तलाश में जंगल की तरफ चल दिए ,शाम होते होते उन्हें एक शिकार मिला ,शिकार के पास ही उन्हें एक सिक्का मिला . शिकार और सिक्का पाकर दोनों मित्रो के चेहरे चमक उठे . दोनों अब तक बहुत थक चुके थे और  भूख, प्यास से हाल बेहाल था .एक ने  दुसरे से कहा ,'हे मित्र इस सिक्के का बाजार से कुछ खाने को ले आओ जिससे पेट की आग बुझ सके .एक बाजार चला गया और दूसरा जंगल में पेड़ के नीचे शिकार के पास बैठ गया .बाजार से उसने लड्डू ख़रीदे लड्डू खरीदते वक़्त उसके मन में ख्याल आया की अगर में अपने मित्र को मार दूँ तो ये शिकार और ये लड्डू सब मेरे ..............और यही सोचकर वो दूकानदार से कहता है भैया एक लड्डू थोड़ा बड़ा बनाना ,उसके बाद उसने कुछ जहर लिया और उस बड़े लड्डू में मिला दिया ताकि पता चल सके की जहर वाला लड्डू कौन सा है और जंगल की तरफ लौट चला .इधर ऐसे ही कुछ ख्याल दुसरे मित्र के ज़हन में पल रहे थे की क्यूँ ना में इसे आते हुए तीर से मार दूँ  और सब कुछ मेरा .बस फिर क्या था .....जैसे ही उसे वो आता दिखाई दिया उसने धनुष पर बाण चढ़ाया और नजदीक आने का इंतजार करने लगा इस सब से अनजान वो तेज क़दमों से पेड़ के नीचे बैठे अपने मित्र की तरफ बढ़ रहा था ...............जैसे ही वो नजदीक पहुंचा पेड़ के नीचे बैठे उसके मित्र ने तीर चलाया और वो वहीँ ढेर हो गया .उसने लड्डू का थैला उठाया और खोलकर देखा की एक लड्डू कुछ ज्यादा बड़ा है और सोचने लगा की कैसा कमीना था अपने लिए बड़ा लड्डू बनवाया होगा जरूर रास्ते में भी खाए होंगे ,अच्छा हुआ मैंने इसे मार दिया ,.....पहले इस बड़े लड्डू को ही खाता हूँ बस फिर क्या था जैसे ही उसने लड्डू खाया उसके भी प्राण पखेरू उड़ गए ,....................और घर में दोनों के बच्चे भूख से मर गए.

"सभी देव कलयुग के इस रूप को देखकर बोले की .," इसमें किंचित भी संदेह नहीं की कलयुग में सृष्टि का समूल नाश होगा .
क्या सच में ,इन्सान कलयुग के उसी दौर से गुजर रहे है?

15 comments:

  1. कलयुग भूल गया था की आप जैसे कुछ अच्छे लोग भी हैं, जो उसकी मंशा पूरी ना होने देंगे.

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  2. बेहतरीन कहानी ........उपदेश देते हुए .

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  3. सही कथा..अब तो आ ही जाईये गद्य लेखन में. पहला प्रयास सफल रहा, बधाई.

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  4. khudgarzi ka zamana hai ....koi bhrose ke layak nahi ......ye kahani jab bhi padhi hai tab yahi vichar man mein baitha h ai

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  5. "दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्य च उत्तर दायकः।
    ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव हि तिष्ठति!!"

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  6. शुक्रिया
    मेरी तस्वीर ? क्या कहूँ अक्सर सुनती रहती हूँ ,मुझे भी वो पसंद हैं .
    बहरहाल आपकी कहानी ,जागो ग्राहक ,रिश्ते;आपकी कोशिशें बुलंद हैं

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  7. bahut achha likha hai.

    Kaliyug mein bhi kuchh log achhe mil jate hain....wo achhe log mere dost hain...

    aabhar !

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  8. AAjkal ho to yahi raha hai. Aapke blog par aaker achaa laga . Umeed aapke blog se rishta bana rahegaa.

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  9. Ek achchhi bodhkatha. yahi to kalyug ka asali chehara hai.

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  10. yehi to kalyug hai...
    acha laga pad kar ......

    Meri Nayi Kavita par aapke Comments ka intzar rahega.....

    A Silent Silence : Zindgi Se Mat Jhagad..

    Banned Area News : Gondwana supercontinent underwent 60-degree rotation during Cambrian explosion

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  11. Get your book published.. become an author..let the world know of your creativity or else get your own blog book!


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  12. bahut khoob, sahi ja rahe hain, shaandar gadh lekhan

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  13. likha to kuchh had tak sahi hai, par kalyug bhul gaya usse takatwar Parmeshwar hain, aur isliye mere to bahut se achhe mitr hain jo hamesha saath dete hain ,sahi margdarshan karate hain............

    Par ye baat to hui alag, aapki lekhni ka pehla namoona dekha gadya roop ka, achha laga padhna.

    shubhkamnayen

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