Thursday, August 19, 2010

जी शाम के लिए तो है !

एक शहर में एक बहुत बड़ा सेठ रहता था, उसके पास अपार धन दौलत थी और एक ही संतान थी ! उसकी पत्नी ने देखा की कुछ दिनों से सेठ के व्यव्हार में बहुत परिवर्तन आ गया है ! ना किसी से बात करते है ना भोजन की सुध ना सोने का ख्याल ,हमेशा सोच में डूबे हुए ,चिन्तनशील और खामोश रहते है ! हाँ काम पर पूरा ध्यान देते !
 जब सेठानी से उनकी ये हालत देखी ना  गयी तो एक रोज उन्होंने सेठ जी से पुछा ,"क्यूँ जी आप किस सोच में डूबे रहते हो ,क्या बात है ?
ये सुनकर सेठ ने एक लम्बी सांस ली और कहने लगा ," प्रिये मेरे हिसाब से अगर मेरी आने वाली छ:पुस्तें हाथ पर हाथ रखकर बैठी रहें और दोनों हाथों से खूब खर्च करे तो भी उनकी ज़िन्दगी ऐश-ओ-आराम से कट जाएगी लेकिन सातवीं पीढी के लिए कमी पड़ सकती है बस में यही सोचकर परेशान हूँ !
                                        सेठानी ने उन्हें समझाया की कोई बात नहीं ,हमारा व्यापार बहुत अच्छा चल रहा है इसलिए आप चिंता ना करें और अपनी सेहत पर ध्यान दें ! लेकिन सेठ के दिल-ओ-दिमाग पर यही बात हावी रही ,उसने अपना पूरा ध्यान और वक़्त अपने व्यापार पर लगा दिया !
                               एक दिन सेठ को लौटते वक़्त रात हो गयी ,पेट में अन्न का दाना भी नहीं था उसने जंगल में दूर दूर तक नजर दौड़ाई कहीं कोई आसरा नजर नहीं आया कुछ दूर और चलने पर उसे एक झोपड़ी दिखाई दी उसने झिझकते हुए आवाज दी ,.........कोई है ? रात काटनी है गर आसरा मिल जाये तो ! अन्दर से एक बूढ़ा अपनी पत्नी के साथ बाहर आया और आतिथ्य सत्कार के साथ भोजन और बिस्तर की व्यवस्था की ! सुबह होते ही सेठ अपने घर को लौट गया !
                              वक़्त बीतता गया और सेठ इस बात को भूल गया , अचानक एक दिन  सेठ की अनाज से भरी गाड़ियाँ उसी रास्ते से जाने वाली थी की सेठ को वो रात याद आई उसने अपने मजदूरों को उस झोपड़ी का पता दिया और हिदायत दी की उस झोपड़ी के मालिक से कहना की ," एक दिन सेठ आपकी कुटिया में रुके थे उन्होंने ये अनाज की बोरियां भेजी है ! और उसकी कुटिया को अनाज की बोरियों से भर देना !
मजदूरों ने मालिक के कहे अनुसार झोपड़ी के सामने गाड़ी रोककर अनाज की बोरियां उतारनी शुरू कर दी और उस बूढ़े आदमी से कहा की इन्हें सेठ ने भिजवाया है  !
                                 बूढ़े ने कहा भैया जरा सुनो मै पूछ लूँ की घर में अनाज है की नहीं ,उसने बाहर से ही अपनी पत्नी को आवाज दी ,"सुनो भागवान ..............सेठ ने अनाज की बोरियां भिजवाई है ,घर में कुछ है की नही ?
अन्दर से आवाज आई ," जी शाम के लिए तो है !

ये सुनकर  बूढ़े ने कहा ," भैया  हमारे पास तो है इन्हें किसी और जरूरतमंद को दे देना !
सेठ ने जब मजदूरों से पुछा तो उन्होंने सारी घटना सुनाई !
सेठ सोच में पड़ गया की उसके पास सिर्फ शाम के लिए है और फिर भी संतुष्ट और शांत है एक मैं हूँ सात पीढ़ी के लिए सब कुछ है फिर भी अशांत और  चिंतित हूँ !
बस फिर क्या था .............................सेठ को  ज्ञान की प्राप्ति हो गयी ! उसने अपना सारा जीवन और धन दीन दुखियों की सेवा में लगा दिया !
अब सेठ भी उस बूढ़े की तरह शांत और संतुष्ट था !

10 comments:

  1. प्रेरक प्रसंग!

    एक निवेदन:

    कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये

    वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:

    डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
    इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..जितना सरल है इसे हटाना, उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये.

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  2. सारगर्भित रचना बधाई

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  3. bahut hi upyuk rachna ,bas yahi to fark hota hai apne apne vicharo me ,koi pakar bhi nahi khush koi santosh se paa raha shukh .sundar .

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  4. Bahut badhiya likhaa hai. Mujhe to bahut hi achha lagaa.

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  5. gyan vardhan wali rachna..........lekin isko padhne se to koi apne account me paise rakhega hi nahi...........he he he

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  6. sahi kaha Neer bhai, Log 7 pidhion ki sochte hain, aajkal, usi me bhrashtachar failta he

    acchi seekh deti story

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  7. neer ji ..bahut hi sarthak kahani hai....aaj ki bhautikta wadi jindai jeene walon ko ek sabak ....

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  8. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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